Sunday, June 17, 2007

An Introduction to the Phenomenon Called 'Ghalib'

गली क़ासिम जान ...

सुबह का झटपटा, चारों तरफ़ अँधेरा, लेकिन उफ़्क़ पर थोङी सी लाली। यह क़िस्सा दिल्ली का, सन १८६७ ईसवी, दिल्ली की तारीख़ी इमारतें। पराने खण्डहरात। सर्दियों की धुंध - कोहरा - ख़ानदान - तैमूरिया की निशानी लाल क़िला - हुमायूँ का मकबरा - जामा मस्जिद।

एक नीम तारीक कूँचा, गली क़ासिम जान - एक मेहराब का टूटा सा कोना -

दरवाज़ों पर लटके टाट के बोसीदा परदे। डेवढी पर बँधी एक बकरी - धुंधलके से झाँकते एक मस्जिद के नकूश। पान वाले की बंद दुकान के पास दिवारों पर पान की पीक के छींटे। यही वह गली थी जहाँ ग़ालिब की रिहाइश थी। उन्हीं तसवीरों पर एक आवाज़ उभरती है -


बल्ली मारां की वो पेचीदा दलीलों की सी गलियाँ
सामने टाल के नुक्कङ पे बटेरों के क़सीदे
गुङगुङाते हुई पान की वो दाद-वो, वाह-वा
दरवाज़ों पे लटके हुए बोसिदा से कुछ टाट के परदे
एक बकरी के मिमयाने की आवाज़ !
और धुंधलाई हुई शाम के बेनूर अँधेरे
ऐसे दीवारों से मुँह जोङ के चलते हैं यहाँ
चूङी वालान के कङे की बङी बी जैसे
अपनी बुझती हुई सी आँखों से दरवाज़े टटोले
इसी बेनूर अँधेरी सी गली क़ासिम से
एक तरतीब चिराग़ॊं की शुरू होती है
असद उल्लाह ख़ान ग़ालिब का पता मिलता है।

दरवाज़े पे लटका टाट का परदा हिला। बूढे से दो पैर नमूदार हुए। मोजङी पुरानी थी एङी के पासद बी हुई। उन्हें घसीटते हुए। मोटी सी मज़बूत लाठी के सहारे ग़ालिब मस्जिद की तरफ बढे। फ़जर के सुर अभी तक फ़िज़ा में गूँज रहे थे। ये ईमान वालोंक ेल िये बुलावा था।

ग़ालिब ने सीढी पार की। मस्जिद के पास पहुँच कर एक आह भरी। सीढियों के पास जूती उतारी। पहली सीढी चढे और रुक गए। अज़ान अब पूरी हो चुकी थी।

इक ख़ामोशी!

चेहरा ऊपर उठा कर देखा, मस्जिद का खुला हुआ दरवाज़ा, उसके ऊपर महराब-उसके पीछे आसमान! ग़ालिब ने फिर आह भरी। आँखें कुछ नम हो गयीं। उसी चेहरे पर ये शेर गूँजा:

ये मसाइले तसव्वुफ़ यह तेरा बयान ग़ालिब
तुझे हम वली समझते जो न बाद ख़्वार होता

मिर्ज़ा उलटे पैरों लौट आए। मोजङी पहनी और गली पारकर, अपने घर की तरफ़ चल दिए। इसपर एक और शेर गूँजा:

हुए मर के हम जो रुसवा हुए क्यूँ न ग़रके दर्या
न कभी जनाज़ा उठता, न कहीं मज़ार होता

किसी आदमी ने गली पार करते हुए मिर्ज़ा को आदाब कहा। मिर्ज़ा ने हाथ उठाया, जवाब में 'आदाब' बुदबुदाया। घर के दरवाज़ेकी चौखट के नीचे पत्थर पर बैठ गए। अंदर से बेग़म की आवाज़ आई-
"लौट आए?"
मिर्ज़ा ने बेगम की तरफ़ देखा भी नहीं, बस बैठे रहे।
"बङे तङके उठ गए थे आज तो!"
बेगम हम उमर थीं मिर्ज़ा की। मिर्ज़ा ने जवाब में कुछ नहीं कहा, बस अप्नी लाठी ज़मीन पर टापते रहे। बेगम परदे के पीछे से झाँक रही थीं। मिर्ज़ा को लगा कि बेगम की नाआऎं उनकी पीठ में गङ रही हैं। बेगम कुछ मायूस सी हुईं।
"गए नहीं?"
फिर कुछ रुक कर बोलीं-
"अभी भी वक़्त है। सुलह कर लो अल्लाह से।"
अब जा कर मिर्ज़ा ने मुँह खोला। जैसे अपने आप से ही मुख़ातिब हों-
"किस मुँह से जाऊँ? सत्तर साल से बुला रहा है। दिन में पाँचों वक़्त आवाज़ दी उसने...मैं...उसके वफ़ादारों में ना था बेगम...अब उससे नहीं, ख़ुद से शर्मिन्दा होता हूँ।"

(collected from the book titled "Mirza Ghalib: ek swanahi munzarnama" by 'Gulzar'



1 comment:

mereshabd said...

yaad hai hamne ....ek raat me khatam ki thi ye....... :)